Generated by All in One SEO v4.9.10, this is an llms.txt file, used by LLMs to index the site. # Poem Panorama My Perception About Life ## Sitemaps - [XML Sitemap](https://poempanorama.in/sitemap.xml): Contains all public & indexable URLs for this website. ## Posts - [Blog](https://poempanorama.in/home-2/blog/) - ["एक और कैंडल मार्च"](https://poempanorama.in/एक-और-कैंडल-मार्च/) - अंतर्मन को हिलाकर रख देने वाली एक और घटना हुई है फिर से हैवानियत ने इंसानियत की अस्मत लूट ली है इंडिया गेट पर एक और कैंडल मार्च निकल रहा है हाथो में मोमबत्ती-पोस्टर लिए लोग निकल पड़े हैं अपने घरों से बहुतों की सेल्फीज़ भी दिख रही है फेसबुक प्रोफाइल पे लगता है देश - ["आजादी सबको है पर"](https://poempanorama.in/aazadi-sabko-hai/) - आजादी सबको है पर हर आज़ादी के कुछ कायदे और कानून है वो भी इसलिए क्यूँकि कल अगर आजादी के साथ जुड़ी हुई सारी सीमायें हटा दी जाये तो इंसान ईश्वर को चुनौती देकर खुद को ही भगवान मान बैठेगा और फिर एक अनसुनी और अनहोनी जंग छिड़ेगी खुद को इकलौता ईश्वर बताने की आज - ["बहते जाना पानी की फितरत है"](https://poempanorama.in/behte-jana-pani-ki-fitrat-hai/) - बहते जाना पानी की फितरत है पर समंदर की लहरों का भी दायरा होता है उनकी लहरों का भी किनारा होता है यूँ तो साथ रहते हैं हम सभी सबको अपना कहते हैं हम सभी पर अक्सर नज़दीकियों में भी फ़ासला होता है अपनों को ठुकराने का हौसला होता है बहते जाना पानी की फितरत - ["मर्ज़ियाँ मोड़ दी तुमने तो राह बदल गई"](https://poempanorama.in/marziya-mod-di-tumne-to-raah-badal-gai/) - मर्ज़ियाँ मोड़ दी तुमने तो राह बदल गई अर्ज़ियाँ मानते तो हम मुसाफिर नहीं होते बस इक सच बोल के मैंने वो सिलसिला शुरू किया था तुम सौ झूठ न बोलते, तो हम तनहा नहीं होते जो वक़्त तुमने तमाम नफरतों में खर्च दिए, हमारा इश्क़ ज़िंदाबाद होता गर तुम थोड़े बहुत भी मेरे जैसे - ["आज फिर जूते पहने है सुबह-सुबह"](https://poempanorama.in/aaz-phir-joote-pehne-hai-subah-subah/) - आज फिर जूते पहने है सुबह-सुबह, आज फिर पूरे दिन नहीं उतरेंगे वक़्त रेत सा फिसलेगा, हम लहरों से लड़ेंगे नज़र साहिल से टकरायेगी, हम थक के भी ना थकेंगे आज फिर होंगे कई यादगार लम्हे आज फिर मिलेंगी कुछ खुशियाँ, कुछ सदमे कुछ से रफीकी बढ़ेगी, कुछ खामखा रक़ीब बनेंगे कुछ से जन्मों के - ["ऐसा नहीं है तुझे तुझसे छीन रहा हूँ मैं"](https://poempanorama.in/aisa-nahi-hai-tujhe-tujhse-cheen-raha-hu-mai/) - ऐसा नहीं है तुझे तुझसे छीन रहा हूँ मैं ऐ ज़िंदगी, तेरी ज़िंदगी में कुछ नए रंग भर रहा हूँ मैं फिसल गया था कभी ज़माने की अंधी दौड़ में जो तेरी उंगली थामकर आहिस्ता-आहिस्ता फिर से चल रहा हूँ मैं इक लौ जो बुझ गयी थी सीने में पिछली आँधियों में वो आग फिर - ["खड़े हैं इस किनारे"](https://poempanorama.in/khade-hai-is-kinare/) - खड़े हैं इस किनारे, जाना है उस पार किसकी सलाह ली जाये जमा है हमारे इर्द-गिर्द नकाबपोशों की फ़ौज़ सच्चा कौन है ये पहचान कैसे की जाये "ऋतेश" - ["कुछ अच्छा करना है तो सोच बदलो"](https://poempanorama.in/kuch-accha-karna-hai-to-soch-badlo/) - कुछ अच्छा करना है तो सोच बदलो ज़िद करो, ज़िद्दी बनो, उठो, रेंगो मत दौड़ो, मंज़िल बहुत दूर नहीं है वो बस तुम्हारी उम्मीद और मेहनत के इक महीन धागे से बंधी है तुम्हारा हौसला उसे और मज़बूत करेगा थको मत, दुनिया बदलने का माद्दा है तुममे खुद को पहचानो और बदल दो खाका इस - ["एक अज़नबी"](https://poempanorama.in/ek-ajnabi/) - शहर में मिला था एक अज़नबी मुझसे बोला उसे मालूम है एक नयी छुपी हुई दुनिया तलक जाने का रास्ता वो वाकिफ है एक जादुई सीढ़ी से जो वहाँ तक जाती है रास्ता बहुत आसान है और सफर बहुत छोटा है उसकी बातो में सिर्फ और सिर्फ सच्चाई झलक रही थी और उसकी भूरी आँखों - ["यादों को यादों की गलियों में छोड़"](https://poempanorama.in/yadon-ko-yadon-ki-galiyo-me-chod/) - यादों को यादों की गलियों में छोड़ ख्वाबों को चुनने हम चल दिए हैं ठंडी सी रात में आँखों को मीचे दिन की तलाश में हम सिरफिरे हैं तलब है उजाले को मुट्ठी में करना अंधेरो को पीछे छोड़कर हम चले है लकीरे हथेली की यूँ ना बदलेंगी बदलने को तक़दीर सजग हैं, अटल हैं - ["तू कुछ और था"](https://poempanorama.in/tu-kuch-aur-tha/) - शक्लो सूरत और किरदार सब बदल लिए तूने वक़्त ने तेरे चेहरे का नक़ाब जो हटाया तू कुछ और था कुछ और ही नज़र आया "ऋतेश" - ["माँ अब नींद नहीं आती"](https://poempanorama.in/maa-ab-neend-nahi-aati/) - माँ अब नींद नहीं आती बस तेरी याद सताती है एक शिकायत है तुझसे अब तू लोरी नहीं सुनाती है रातें बिन सपनो की हैं दुनियां बिन अपनों की है वैसे तो कोई दर्द नहीं बस तेरी याद रुलाती है माँ अब नींद नहीं आती बस तेरी याद सताती है एक शिकायत है तुझसे अब - ["क्या तुमने वो लड़की देखी है?"](https://poempanorama.in/kya-tumne-wo-ladki-dekhi-hai/) - क्या तुमने वो लड़की देखी है? अभी कुछ देर पहले जिसके ठहाकों से ये घर गूँज रहा था उसके नंगे ज़मीन से रगड़ते हुए पाओं की सरसराहट अभी तो गुजरी थी बगल से क्या तुमने वो लड़की देखी है? अपनी उलझी हुई लटों में उसने पूरा घर सुलझा रखा था घर में रौशनी रहे सूरज - ["बात वो नहीं जो तुम समझ रहे हो "](https://poempanorama.in/baat-wo-nahi-jo-tum-samjh-rhe-ho/) - बात वो नहीं जो तुम समझ रहे हो फर्क सिर्फ अंदाज़े-बयां का है ये सन्नाटा कुछ और नहीं, अंदेशा किसी बड़े तूफ़ान का है लगता है बदलेगी तस्वीर ज़िंदगी की दोबारा लिखी जाएगी तक़दीर ज़िंदगी की इस नयेपन पे मत जाओ, अंदाज़ा किसी बड़े बदलाव का है बात वो नहीं जो तुम समझ रहे हो - ["तेरी मीठी रातों से इक रात चुराने आया हूँ"](https://poempanorama.in/teri-meethi-raaton-se/) - तेरी मीठी रातों से इक रात चुराने आया हूँ तेरी नीली आँखों से कुछ ख्वाब चुराने आया हूँ ना दे इल्ज़ाम तू चोरी का, मैं चोर नहीं दीवाना हूँ इस रात की बस औकात मेरी, मैं नन्हा इक परवाना हूँ ले चलूँ तुझे तारों की छाँव, आ चल मैं लेने आया हूँ तेरी मीठी रातों - ["छुपा लूंगा दर्द के हर निशाँ"](https://poempanorama.in/chupa-lunga-dard-ke-har-nishan/) - छुपा लूंगा दर्द के हर निशाँ और डाल दूंगा मिट्टी की इक मोटी परत उनपे वापस बोऊंगा नए बीज कल्पनाओं के, सपनों के खड़ा करूँगा इक नया पेड़, भले इक सदी खर्च दूँ फिर से पर मैं नहीं पहनूंगा कोई नक़ाब मैं नहीं बदलूंगा वक़्त की किसी चाल पे बनाऊंगा इक नया आशियाँ इक नया - ["वो लड़का खामोश खड़ा"](https://poempanorama.in/wo-ladka-khamosh-khada/) - वो लड़का खामोश खड़ा खिड़की से उस बिलकुल नए सूरज की ओर देख रहा था जो सुबह-सुबह अपनी पीली धूप से उसकी आँखे चकाचौंध कर रहा था बहुत तेज़ी से उसका सब कुछ उससे छूट रहा था जैसे सर्द रात की ओस घांस में अटकी रही हो, इठला रही हो अपने जीवन पे पर सहसा - ['चाँद की दूधिया रौशनी में'](https://poempanorama.in/chand-ki-dudhiya-roshni-me/) - चाँद की दूधिया रौशनी में रात की पगडण्डी पे कल कुछ सिरफिरे ख्वाबों ने वापस से बगावत कर दी इस बात को लेकर के वो बस ख्वाब ही रहना नहीं चाहते थे क्यूंकि वो बेहद ऊब चुके थे अपने सच होने के इंतज़ार में आखिर उनमे से कुछ बूढ़े सपने भी तो थे, जो बरसो - ["तेरी उंगली थामकर"](https://poempanorama.in/teri-ungli-thamkar/) - तेरी उंगली थामकर ज़िंदगी के जिस मोड़ से मैं निकल चुका हूँ मैं जाना नहीं चाहता वहां वापस कभी, ना ही चाहता हूँ के ये कारवां थमे कहीं बस यूँ ही चलता रहूँ, मुस्कुराता रहूँ, तुम्हे मुस्कुराता देखकर मैंने छोड़ दिया था अपने ग़मों का पिटारा वहीँ उसी मोड़ पर कहीं जब देखा था तेरे माथे - ["मज़बूर हूँ, आ नहीं सकता तेरी पनाह में "](https://poempanorama.in/mazboor-hu-aa-nahi-sakta-teri-panaah-me/) - मज़बूर हूँ, आ नहीं सकता तेरी पनाह में गुस्ताख़ हवा का इक झोंका भेजा है हौले से तुम्हे छू कर गुज़र जायेगा बिखरी हुई जुल्फों को खुद ना सुलझाना उन्हें रहने देना थोड़ी देर, लाल सुर्ख गालों पर, इठलाने देना मैं कल लौटूंगा तो उन्हें कान के पीछे आहिस्ते से लगा दूंगा मज़बूर हूँ, आ - ["जो कह ना पाई बात तुमसे"](https://poempanorama.in/jo-keh-na-pai-baat-tumse/) - जो कह ना पाई बात तुमसे, आज फिर कैसे कहूँ होंठो पर ही है रखी, ज़ज़्बात तुमसे क्या कहूँ वो पहली झलक, कमसिन अदा वो झुकती पलक, गालों पर हया तेरे दीदार का असर कुछ इस तरह मुझ पर हुआ मुझमे मैं अब मैं नहीं, तू ही तू बस तू रहा है दब गई जो - ["सोचिये आज कैसे ये हालात हैं"](https://poempanorama.in/sochoiye-aaz-kaise-ye-haalat-hai/) - सोचिये आज कैसे ये हालात हैं बदले से सबके खयालात हैं अपनों के लिए वक़्त की कमी है हमे गैरों पे हम इतने मेहरबान हैं ""ऋतेश" - ["हैं ढेरों कश्तियाँ सामने मेरे"](https://poempanorama.in/hai-dhero-kashtiyan/) - हैं ढेरों कश्तियाँ सामने मेरे समझ नहीं आता किसे साथ लेकर दरिया पार हो जाऊँ या डूब कर दरिया का ही हो जाऊं “ऋतेश”" - ["सुबह तक रख ले ना आज चाँद को अपने आँचल में"](https://poempanorama.in/subha-tak-rakh-le/) - सुबह तक रख ले ना आज चाँद को अपने आँचल में कल पहली किरण के साथ ही अलविदा कह दूंगा चला जाऊंगा चाँद को साथ लेकर कहीं बहुत दूर, तेरे दिन के उजाले से कल से बस इसके हिस्से में अमावस होगी, वादा करता हूँ देख ना कैसे तड़प रहा है तेरी पनाह पाने को, - ["सुबह के ६ बजे दरवाजे पे दस्तक पर"](https://poempanorama.in/subah-ke-6-bje/) - सुबह के ६ बजे दरवाजे पे दस्तक पर माँ ने दरवाजा खोला कोदई की माँ बर्तन धोने आई थी हम दुबके पड़े थे रजाई की आगोश में भरी शीतलहर में, कोदई की माँ मील चलकर आई थी माँ रोज कहती, अम्मा इतनी ठण्ड में मत आया करो बूढ़े बदन में ठण्ड लग जाएगी, घर पे - ["वो रौबदार मूंछो वाला आदमी"](https://poempanorama.in/wo-raubdaar-mucho-wala-aadmi/) - वो रौबदार मूंछो वाला आदमी बड़ा मायूस है बेटी की विदाई ने उसकी सूखी आँखों को डबा-डब कर दिया है आखिर बड़े ही नाज़ों से पाला था उसे अब दूसरे की उंगली थमा दी है उम्र भर के लिए बेटी कितनी बड़ी हो गई है अब जाके उसे एहसास हुआ नम आँखों से एक बाप - [नज़्म जो लिखे थे तुम पर- A Romantic Hindi Poem Video By Ritesh Mishra](https://poempanorama.in/nazm/) - [सुना है पिछली रात तुम बहुत रोये थे | An Emotional Hindi Poem | By "Ritesh Kumar Mishra"](https://poempanorama.in/suna-hai-pichli-raat-tum/) - ["सांसो की सुई में वक़्त का धागा डालकर"](https://poempanorama.in/sanso-ki-sui-me/) - [किसकी तलाश में हो](https://poempanorama.in/kiski-talaash-me-ho/) - किसकी तलाश में हो क्या ढूंढ रहे हो तुम क्या क्या याद है तुम्हे अब तलक क्या खुद को ही भूल गए हो तुम क्या तुम में वो बात है क्या तुम्हारी औकात है कौन से सवालों में उलझे हुए हो किसके जवाब से परेशां हो तुम आग है अभी भी या सिर्फ राख बची - ["ना रिश्तों की झँझट होती"](https://poempanorama.in/na-rishton-ki-jhanjhat-hoti/) - ["मैं इंसान ही जन्मा था मैं इंसान ही मरूंगा"](https://poempanorama.in/mai-insaan-hi-janma-tha-insaan-hi-marunga/) - हर बात में एक कहानी छुपी है जिसके पीछे किरदार छिपे है अलग-अलग नक़ाब लगाए हुए, छुपाते है अपनी असल शक़्ल को इस क़दर जो कभी सामना हो खुद का आईने से तो खुद की आँख भी धोखा खा जाये और नक़ाब ओढ़े हुए किरदार को खुद भी ना पहचान पाए यही फलसफा है दुनिया - ["थोड़ा सा फर्क पड़ेगा, तुम्हे भी और मुझे भी"](https://poempanorama.in/thoda-sa-fark-padega/) - थोड़ा सा फर्क पड़ेगा, तुम्हे भी और मुझे भी जब हम दूर हो जायेंगे, नदी के दो किनारो के जैसे जो कभी नहीं मिलते थोड़ा सा फर्क पड़ेगा, तुम्हे भी और मुझे भी जब हम चुप हो जायेंगे, पत्थर की तरह जो कभी बोलते नहीं थोड़ा सा फर्क पड़ेगा, तुम्हे भी और मुझे भी जब - ["तुझे ख्वाब लिखूं, मेहताब लिखूं, आरज़ू लिखूं, ज़ुस्तज़ू लिखूं या कुछ और"](https://poempanorama.in/tujhe-khwaab-likhu-mehtaab-likhu/) - तुझे ख्वाब लिखूं, मेहताब लिखूं, आरज़ू लिखूं, ज़ुस्तज़ू लिखूं या कुछ और तेरा मासूम सा अल्हड़पन छेड़ देता है मन के सारे तार और गूँज उठता है इक संगीत आबो-हवा में सच कहूँ तपती रेत में पहली बरसात सी लगती है तू मुझे बहका देती है तेरी कस्तूरी जब तू गुज़रती है हिरनी सी मदमस्त - ["तेरी मुस्कराहट कहीं गुम ना हो जाये"](https://poempanorama.in/teri-muskurahat/) - डरता हूँ तेरी मुस्कराहट कहीं गुम ना हो जाये एक पूरा मौसम लगता है उसे वापस तुम्हारे होंठो तक ला पाने में मुझको “ऋतेश“ - ["नज़्म जो लिखे थे तुम पर"](https://poempanorama.in/nazm-jo-likhe-the-tum-par/) - नज़्म जो लिखे थे तुम पर कई साल पहले सर्दियों में जाने कहाँ छिटक कर गिर गए हैं वो मेरी डायरी से मैंने बहुत ढूँढा पर कहीं ना मिला अब तक कुछ भी हाँ मगर धुंधला सा याद है थोड़ा बहुत जोड़ कर देखूंगा हर्फ़ दर हर्फ़ शायद कहीं वो अधूरी नज़्म मुकम्मल हो जाये - ["नहीं शौक तुझसे आज़माइश करूँ मैं"](https://poempanorama.in/nahi-shauq-tujhse-aazmaish-karu-mai/) - नहीं शौक तुझसे आज़माइश करूँ मैं तुमसे बेहतर ही था तुमसे बेहतर ही हूँ वक़्त की टिकटिक पर कब टिका हूँ मैं आवारा ही था आवारा ही हूँ आवारा ही था आवारा ही हूँ! “ऋतेश“ - ["तू परेशान है तो आसानी किसको है"](https://poempanorama.in/tu-pareshan-hai-to-aasani-kisko-hai/) - Ritesh Kumar Mishra - ["भूले से भी ना भूलेगी, हॉस्टल की वो पहली रात "](https://poempanorama.in/bhule-se-bhi-na-bhulegi-hostel-ki-wo-pehli-raat/) - भूले से भी ना भूलेगी, हॉस्टल की वो पहली रात याद रहेगी जीवन भर को सीनियर्स की सिखाई हर इक बात सबसे पहले इंट्रो होता, फिर चलते शब्दों के बाण कोई कहता डांस दिखाओ, मुश्किल में तब पड़ जाती जान भूले से भी ना भूलेगी, हॉस्टल की वो पहली रात.................... कोई जीन्स-टीशर्ट पे चिढ़ता, किसी - ["पलकों पर ही रखा था"](https://poempanorama.in/palko-par-hi-rakha-tha/) - पलकों पर ही रखा था उसे और उसके ख्वाब को आँखे खोली दोनों फिसल गए वो सदियों के लिए रूठ गया मुझसे मैं और मेरे ख्वाब टूटकर बिखर गए मेरे ही पहलू में “ऋतेश “ - ["कलाम चला गया"](https://poempanorama.in/kalaam-chala-gya/) - 'मिसाइल मैन' 'भारत रत्न' 'पूर्व राष्ट्रपति' डा.ए पी जे अब्दुल कलाम भाव भीनी श्रद्धांजलि ................ सपने कैसे देखते हैं, वो बड़ी ज़ुल्फ़ों वाला सिखा गया जाते जाते वो फिर से इंकलाब जगा गया सुना है जबसे स्तब्ध है ये दिल, आसमां भी रो रहा है वो बड़ी ज़ुल्फ़ों वाला "कलाम" चला गया ख़ूबसूरती दिल में - ["फुरसत नहीं इबादत की तो खुदा से"](https://poempanorama.in/fursat-nahi-ibadat-ki/) - फुरसत नहीं इबादत की तो खुदा से तो शिकायत ना करें ना जीत सकें औरो से, तो अपनों से ना लड़े उलझने कम नहीं हैं इस ज़माने में, इन्हे और न बढ़ाएं सुलझाएं इन्हे खुद से, औरों पे न मढ़े माना उलझी हैं, हाथों और माथे की लकीरें चलें वक़्त के साथ, वक़्त से न - ["इक और साल गुज़र रहा है"](https://poempanorama.in/ik-aur-saal-guzar-raha-hai/) - इक और साल गुज़र रहा है, कुछ नमकीन कुछ मीठी यादें देकर इक नया साल सामने खड़ा है, वक़्त के अनजान टुकड़ों को पोटली में बांधकर नए लिबास में कितना मासूम दिख रहा है अपनी पलकें खोलने को बेकरार खड़ा है उमीदों का बहुत बोझ होगा इस आने वाले साल पर कई अनसुलझे सवालों के - ["सरोज दिन-रात बुनती है कुछ मीठे सपने"](https://poempanorama.in/saroj-din-raat-bunti-hai-kuch-meethe-sapne/) - सरोज दिन-रात बुनती है कुछ मीठे सपने फिर उधेड़ती है, वापस बुनती है और थोड़ी देर में भूल जाती है सपनों के ऊन का गोला कहीं फिर झुंझलाती है, और बेरंग हो जाते हैं उसके सारे सपने............................................................. मैंने बेहद करीब से देखा है, इक मासूम सा बचपन अभी भी तैरता है उसकी आँखों में जो - ["अपना-अपना सब करते हैं"](https://poempanorama.in/apna-apna-sab-karte-hain/) - अपना-अपना सब करते हैं, सबका क्या है पता नहीं इस झूठी धोखेबाज़ दुनियाँ में, अपना कौन है पता नहीं पैर लगा आगे बढ़ जाओ, वक़्त यही अब मांग रहा सफलता तमको तभी मिलेगी, हर व्यक्ति यही अब जान रहा गैरों की खातिरदारी में, रिश्तों की परवाह नहीं अपना-अपना सब करते हैं, सबका क्या है पता - ["हवा चली, पत्ते हिले"](https://poempanorama.in/hawa-chali-patte-hile/) - हवा चली, पत्ते हिले, कुछ टूट गए, कुछ लगे रहे कुछ को कीड़ों ने खाया था, कुछ ताज़ा थे कुछ सड़े-गले सबकी ख्वाहिश सब जुड़े रहे, पर मौत कहा वो टाल सके किस पल को रुखसत होना है, ये राज़ कहा वो जान सकेकुछ के जाने पर कुछ रोये, कुछ से सब अनजान रहे कुछ - ["सुना है पिछली रात तुम बहुत रोये थे"](https://poempanorama.in/suna-hai-pichli-raat-tum-bahut-roye-the/) - सुना है पिछली रात तुम बहुत रोये थे आँखों का सारा काजल फैला दिया था अपने गालों पर सुबह के तारे ने सब बता दिया है मुझको आंसू पोछ लो अब और मत रोना उस चाँद के लिए सदियों की अमावस तुम्ही ने मांगी थी उससे गुस्से में आकर और वो छुप गया है अँधेरा - ["फलक पे आधा चाँद"](https://poempanorama.in/falak-pe-aadha-chand/) - फलक पे आधा चाँद लुका-छिपी खेल रहा था बादलों की ओट से ज़मीं पे लालटेन की लौ लड़ रही थी मद्धम हवा से सामने बह रही शांत सी नदी में लहरों का एक कारवां गुज़र रहा था बिना रुके-थके हर इक लहर चल रही थी बड़े कायदे से आगे वाली लहर की ऊँगली थामकर किसी - ["तेरी यादों का तुझसे मुकम्मल कोई और खरीददार नहीं"](https://poempanorama.in/teri-yadon-ka-tujhse-mukammal/) - दिल की दराज़ से हर एक याद निकाली आहिस्ते से यादों पे पड़ी धूल झाड़ी हर याद को बड़े करीने से संभाला खट्टी- मीठी यादों को अलग- अलग झोले में डाला सोचा बेंच दूंगा इन्हे कोई अच्छा सा खरीददार देखकर और चल पड़ा मैं सपनो के बाजार में, कुछ यादों का सौदा करने शाम से - ["गुलमोहर का वो पेड़"](https://poempanorama.in/gulmohar-ka-wo-ped/) - गुलमोहर का वो पेड़ जहा हम पहली बार मिले थे कुहरा-कुहरा चारो ओर था, गेंदे के फूल खिले थे ख़ामोशी थी चारो ओर और सुबह के सात बजे थे उनको तब पढ़ने जाना था, पर वो मेरे लिए खड़े थे गुलमोहर का वो पेड़ जहा हम पहली बार मिले थे.......... होंठ उनके कांप रहे थे, - ["किसी को हद से ज्यादा चाहने पर ऐतराज़ रहा "](https://poempanorama.in/kisi-ko-had-se-jyada-chahne-par-etraz-raha/) - किसी को हद से ज्यादा चाहने पर ऐतराज़ रहा किसी को बस हमारा इंतज़ार रहा उलझ कर रह गए हम रिश्तों की बेड़ियों में सिर्फ वही था जिसे हमसे नफरत थी ऐसे बहुत थे जिन्हे सिर्फ हमसे प्यार रहा" “ऋतेश “ - ["मैं खुश हूँ इसका उसे कोई गम है"](https://poempanorama.in/mai-khush-hu-iska-use-koi-gum-hai/) - मैं खुश हूँ इसका उसे कोई गम है वो खुश है इसका मुझे कोई गम है मतलब साफ़ है, ऐ मेरे यारों यहां भी कोई गम है, वहाँ भी कोई गम है" “ऋतेश “ - ["सुबह देर से क्यूँ नहीं आती"](https://poempanorama.in/subah-der-se-kyu-nahi-aati/) - सुबह देर से क्यूँ नहीं आती, हर दोपहर उठकर सोचता हूँ रात जल्दी क्यूँ नहीं सोती, हर सुबह सोकर सोचता हूँ क्यूँ सोचता हूँ, ज़िंदगी के मायने कायदों से हटकर क्यूँ नहीं रह पाता, मैं सर्द रात सा सिमटकर मंज़िल जल्दी क्यूँ नहीं आती, हर मोड़ ठहरकर सोचता हूँ सुबह देर से क्यूँ नहीं आती, - ["रंग-बिरंगी इस दुनियां में"](https://poempanorama.in/rang-birangi-is-duniya-me/) - रंग-बिरंगी इस दुनियां में, मै आज क्यूँ इतना बेरंग सा हूँ फैली हुई इस धरती पे, मैं आज क्यूँ इतना तंग सा हूँ सांसे कुछ घुटी-घुटी सी हैं, हूँ आज परेशान हालातों से सुलझी हुई कुछ बातों में, मैं आज क्यूँ इतना उलझा सा हूँ रंग-बिरंगी इस दुनियां में, मै आज क्यूँ इतना बेरंग सा - ["आज़ादी की सालगिरह पर"](https://poempanorama.in/aazadi-ki-saalgirah-par/) - आज़ादी की सालगिरह पर सबमे है उन्माद भरा उम्र हो गई अड़सठ की, अब जाके देश जवान हुआ बीता बचपन ठोकरों में इसका, सभ्यता को भी ठेस लगी पड़ गई दरार संस्कृति में, जाति-पति की आग लगी पश्चिमी विकास की आंधी में, सामाजिक मूल्यों की बलि चढ़ी इस देश का जाने क्या होगा, अपराधियों के - ["ज़िंदगी हर तरफ ज़ुदा है"](https://poempanorama.in/zindgi-har-taraf-zuda-hai/) - ज़िंदगी हर तरफ ज़ुदा है गर हम पहले के सिवाय कहीं और फ़िदा हैं ऋतेश “ - ["आसमाँ आज तारों से नहीं भरा है"](https://poempanorama.in/aasma-aaz-taaron-se-nahi-bhara-hai/) - आसमाँ आज तारों से नहीं भरा है काली बदलियाँ घिरी पड़ी हैं रातरानी के फूल खिल गए हैं मद्धम मद्धम बूंदे पड़ रही हैं और हवाएँ महक रही हैं मैं ऐसा हूँ के जैसा नहीं हूँ, मैं जैसा था, अब वैसा नहीं हूँ हर तरफ अँधेरा सा है, और मैं लाचार हूँ ज़िंदगी की कश्मकश - ["कैंटीन की वो तेरह सीढ़ियां"](https://poempanorama.in/canteen-ki-wo-terah-seedhiya/) - कैंटीन की वो तेरह सीढ़ियां बड़ी मायूस हैं, ए दोस्त खामोश रहकर भी जाने कितने सवाल कर जाती हैं उन सीढ़ियों के साथ मुझे भी यकीन है, वो लम्हे तुम भी भुला नहीं पाये होगे | ये वो तेरह सीढ़ियां हैं जहाँ पर कुछ चेहरों की मुस्कराहट एक पोटली में बंधी है और सब उसे - ["तू पास नहीं तो क्या हुआ"](https://poempanorama.in/tu-pas-nahi-to-kya-hua/) - तू पास नहीं तो क्या हुआ हर रोज़ तेरे ख्वाबो से ज़रा सी ज़िंदगी उधार लेता हूँ फिर निकल पड़ता हूँ एक सुनसान सड़क पर, तुम्हारी तलाश में जो शाम तक मुझे थकाकर, फिर ले आती है तुम्हारे ख्वाबों के पनाह में थोड़ी सी ज़िंदगी उधार मांगने “ऋतेश “ - ["ये पल कभी भूलने वाले नहीं हैं"](https://poempanorama.in/ye-pal-kabhi-bhoolne-wale-nahi-hai/) - ये पल कभी भूलने वाले नहीं हैं ये वो कल हैं जो फिर आने वाले नहीं हैं संभाल कर रखना इनको दिल में कहीं ये वो बादल हैं जो फिरसे बरसने वाले नहीं हैं दफ़न हो जायेंगे ये पल भी ज़िन्दगी की किताब में पलटना कभी अकेले इन पन्नो को हमारी याद में हम न - ["अभी- अभी तो उड़ना सीखा था"](https://poempanorama.in/abhi-abhi-to-udna-seekha-tha/) - अभी-अभी तो उड़ना सीखा था हवाओं से लड़ना सीखा था वक़्त ने हमारे पर काट लिए अभी अभी तो मुस्कुराना सीखा था तमन्ना थी की आसमाँ को नापेंगे है दम कितना खुद में ये जाचेंगे पर पहली ही उड़ान में तूफ़ान आ गया हमने तो अभी इस डाल से उस डाल पर फुदकना सीखा था - ["मैं कैसे भूल सकता हूँ "](https://poempanorama.in/mai-kaise-bhool-sakta-hu/) - वो मंज़र वो समंदर, मैं कैसे भूल सकता हूँ वो उजली रात, वो मीठी बात, मैं कैसे भूल सकता हूँ तेरा खिड़की के किनारे से मुझको तकना वो आँखों के इशारे से शिकायत करना वो हर याद, वो मुलाकात, मैं कैसे भूल सकता हूँ वो मंज़र वो समंदर, मैं कैसे भूल सकता हूँ है तू - ["डबडबाई दो झीलों से"](https://poempanorama.in/dabdabai-do-jheelon-se/) - डबडबाई दो झीलों से बह चलीं खारे पानी की नहरें बात कुछ नहीं, बस उनकी याद आ गयी और छू गयीं, किनारों को लहरें " “ऋतेश “ - ["कहाँ गयीं वो कहानियाँ भरी रातें "](https://poempanorama.in/kahan-gai-wo-kahaniya-bhari-bateen/) - कहाँ गयीं वो कहानियाँ भरी रातें घर के बुजुर्गों की सहूलियत भरी बातें चूल्हे पर सिकीं वो रोटियां कहाँ छिपाई है माँ ने मिठाई, रास्ता बताती वो चीटींया कहाँ गए वो खेलने कूदने के दिन कहाँ गयी वो मस्तियाँ बहते वक़्त में छूट गए वो हंसी किनारे कट जाएगी ज़िंदगी उन यादों के सहारे अब - ["इतना मुश्किल भी नहीं है, ये जीवन जीना"](https://poempanorama.in/itna-mushkil-bhi-nahi-hai/) - इतना मुश्किल भी नहीं है, ये जीवन जीना ज़रूरी है इक अच्छा इंसान बनना जीत की महक इक दिन ज़रूर आएगी ज़रूरी है एक सच्चा इंसान बनना 'यूँ तो ख़ुशी और दर्द मिलते ही रहते हैं ज़रूरी है दर्द को रेत पर लिखना और खुशियों को पत्थरों पर तराशना' रेत पर लिखा दर्द, हवा के - ["छोड़कर करवटें बदलना"](https://poempanorama.in/chodkar-karvaten-badalna/) - छोड़कर करवटें बदलना उठ जिंदगी तू नींद से कुछ पाने की उम्मीद से उठ जिंदगी तू नींद से नाज़ुक है सपनों की हक़ीक़त से कड़ी लेकर हाथों में पैगाम, सुबह की पीली धूप खडी बदल दे दुनिया का खाका, तू अपनी पहचान से तोड़कर ख्वाबों का धागा उठ जिंदगी तू नींद से कुछ पाने की - ["कवितायेँ"](https://poempanorama.in/kavitayen/) - कवितायेँ माध्यम हैं अपनी संवेदनाओ को बताने की, कवितायेँ साधन है भीगी पलकों को सुखाने की, ये हर दर्द को पन्नो पे खुरच देती हैं, और हर ख़ुशी में आहिस्ते से हँस देती हैं, कवितायेँ राह है मंज़िल पाने की, कवितायेँ उम्मीद हैं सपने सजाने की, कवितायेँ माध्यम हैं अपनी संवेदनाओ को बताने की, कवितायेँ साधन ## Pages - [Poem Panorama](https://poempanorama.in/) - Explore the world of Hindi poetry on Poem Panorama, your one-stop shop for all things Hindi poetry. - [Poetry Videos](https://poempanorama.in/category/poetry-videos/) - [Inspirational](https://poempanorama.in/category/inspirational/) - Uplift your spirits and find motivation in my collection of inspirational Hindi poems. 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